Wednesday, June 24, 2015

हड्डियाँ बन जाएँगी फौलाद

आज के समय में अधिकतर लोग शरीर में कैल्शियम की
कमी से जूझ रहे है .कैल्शियम की कमी के कारण शरीर
में दर्द लगातार बना रहता है .. महिलाओं में यह
समस्या ज्यादा पायी जाती है ..तरह तरह की
कैल्शियम की टेबलेट्स खाकर भी समस्या का
समाधान नहीं होता ..इन्ही समस्याओं के निवारण
के लिए एक बेहद असरदार प्रयोग पर आज चर्चा की
जाएगी.
सामग्री--- (1) हल्दीगाँठ 1 किलोग्राम (2)
बिनाबुझा चूना 2 किलो
विधि – सबसे पहले किसी मिट्टी के बर्तन में चूना
डाल दें .अब इसमें इतना पानी डाले की चूना पूरा डूब
जाये ..पानी डालते ही इस चूने में उबाल सी उठेगी
..जब चूना कुछ शांत हो जाए तो इसमें हल्दी डाल दें
और किसी लकड़ी की सहायता से ठीक से मिक्स कर
दे ..
इस हल्दी को लगभग दो माह तक इसी चूने में पड़ी रहने
दे .. जब पानी सूखने लगे तो इतना पानी अवश्य
मिला दिया करे की यह सूखने न पाए ....
दो माह बाद हल्दी को निकाल कर ठीक से धो लें
और सुखाकर पीस ले और किसी कांच के बर्तन में रख लें
.
सेवन विधि---
(1) वयस्क 3 ग्राम मात्रा गुनगुने दूध में मिलाकर दिन
में दो बार
(2) बच्चे – 1 से 2 ग्राम मात्रा गुनगुने दूध में मिलाकर
दिन में दो बार
लाभ -- कुपोषण, बीमारी या खानपान की
अनियमितता के कारण शरीर में आई कैल्शियम की
कमी बहुत जल्दी दूर हो जाती है और शरीर में बना
रहने वाला दर्द ठीक हो जाता है
.
ये दवा बढ़ते बच्चों के लिए एक अच्छा bone टॉनिक
का कामकरती है और लम्बाई बढ़ाने में बहुत लाभदायक
है
टूटी हड्डी न जुड़ रही हो या घुटनों और कमर में दर्द
तो अन्य दवाओं के साथ इस हल्दी का भी प्रयोग
बहुत अच्छे परिणाम देगा।

Tuesday, June 23, 2015

कुछ आसान उपाय झाइयाँ मिटाएँ

झाइयाँ अक्सर बढ़ती उम्र के साथ बढ़ती जाती हैंजो देखने में अच्छी नहीं लगती हैं। तेज धूप के कारण और शारीरिक स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण भी चेहरे पर झाइयाँ पड़ जाती हैं। झाइयों की समस्या से घरेलू उपचार द्वारा आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है।झाइयों को समाप्त करने के कुछ घरेलू उपाय इस प्रकार हैं-


झाइयाँ अकसर पेट की खराबी से होती हैं या फिर अधिक तनावग्रस्त रहने से. खुश रहें,चिंता न पालेंपानी खूब पिएँदिन में कम से कम एक बार नीबू निचोड़कर पिएँ।

बरगद का दूध चेहरे पर प्रतिदिन मलें। बीस मिनट बाद ठंडे पानी से धो डालें। बरगद के दूध में बहुत शक्ति व शीतलता होती है। इससे एक सप्ताह में आपकी छाइयाँ समाप्त हो जाएंगी।

सफेद जीराकाला जीरासरसों और काला तिल बराबर मात्रा में लेकर गाय के दूध में पीसकर लेप करने या उबटन करने से झाइयाँ और चेहरे के दाग दूर हो जाते हैं।

आलू को घिसकर चेहरे पर लगाएँ।

कटे टमाटर को चेहरे पर रगड़ना फायदेमंद होता है।

खीरे के रस में जैतुन के तेल की बूँद मिलाकर लगाएँ।

*  केले के गुदे को चेहरे पर लगाने से झाइयाँ मिटती हैं।

गाजर के रस में पिसी बादाम व कच्चे दूध को मिलाकर लगाएँ।

रोजाना बादाम का तेल चेहरे पर लगाएँ।

खरबूज के बीज व छिलकों को थोड़ा पानी मिलाकर बारीक पीस लें। अप इस लेप को चेहरे पर 15 मिनिट तक लगा रहने दें। फिर पानी से चेहरा धो लें। इस पैक को रोजाना चेहरे पर लगाने से आपके चेहरे की झाइयाँ दूर होंगी।

आधी कटोरी उड़द की दाल के पावडर में दो चम्मच गुलाबजलएक चम्मच ग्लिसरीन व दो चम्मच बादाम रोगन मिलाकर इस लेप को चेहरे पर कुछ देर लगाकर रखें फिर हल्के गुनगुने पानी से चेहरा धो लें।

चेहरे की झाइयाँ दूर करने के लिए आप आधा नीबू व आधा चम्मच हल्दी और दो चम्मच बेसन लें। अब इन चीजों को आपस में अच्छी तरह मिलाकर पेस्ट-सा बना लें। अब इस मिश्रण का मास्क चेहरे पर तीन या चार बार लगाए। झाइयाँ समाप्त हो जाएँगी और आपका चेहरा भी निखर जाएगा।

चेहरे पर ताजे नीबू को मलने से भी झाइयों में लाभ होता है।

चेहरे पर झाइयाँ तेज धूप पड़ने के कारण भी हो जाती हैं। अतः तेज धूप से जहाँ तक हो सके चेहरे को प्रभावित न होने दें।

सेब खाने और सेब का गूदा चेहरे पर मलने से भी झाइयाँ दूर होती हैं।

रात को नींद न आने से भी चेहरे पर झाइयाँ पड़ जाती हैंजिन्हें दूर करने के लिए रात को सोने से पहले चेहरे को अच्छी तरह धोएँ। तदुपरांत एक चम्मच मलाई में तीन या चार बादाम पीसकर दोनों का मिश्रण बना लेंफिर इस मिश्रण को चेहरे पर लगाकर हल्के हाथों से मसाज करें और सो जाएँ। प्रातः उठकर बेसन से चेहरे को धो लें। इस प्रयोग से आपको आश्चर्यजनक लाभ होगा।

झाइयों को समाप्त करने के लिए आप भोजन में सलाद का नियमित प्रयोग करें।

दिन में एक गिलास गाजर का रस बिना नमक-मिर्च मिलाए पिएँइससे चेहरा तो सुर्ख सफेद होगा हीसाथ ही झाइयाँ भी समाप्त हो जाएँगी।

ताजा टमाटर काटकर चेहरे पर हल्के हाथों से मसाज करने से थोड़े दिनों के उपरांत चेहरे की 
झाइयाँ कम हो जाएँगी और रंगत भी निखर जाएगी।
उम्र बढ़ने के अलावा सूरज की तेज रोशनीप्रदूषणधूम्रपानतनाववजन कम होना और शरीर में विटामिन ई की कमी के कारण असमय ही त्वचा पर झुर्रियां पड़ने लगती हैं। आइए जानते हैं कुछ ऐसे उपायजो प्राकृतिक रूप से त्वचा को झुर्रियों से मुक्त कर सकती है।

*
 अच्युताय एलोवेरा जेल त्वचा को मुलायम व कोमल बनाती है  ।सूर्य की तेज किरणों ,धुल. केमिकल्स आदि से त्वचा पर होनेवाले प्रभाव से रक्षा करता है! कील मुँहासेकाले दागझुर्रियाँ आदि को दूर करता है ।
1.पपीता: नहाने से पहले चेहरे और गर्दन पर पपीते का टुकड़ा रगड़ने से त्वचा कोमल होती है। इसमें मौजूद पापेन नामक तत्व त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने और नई कोशिकाओं को विकसित करने में सहायक होता है।
2.केला: चेहरे व गर्दन पर केले का छोटा-सा टुकड़ा हफ्ते में एक बार रगड़ना चाहिए।

3.डिहाइड्रेट त्वचा कांतिहीन दिखती हैइसलिए भरपूर पानी पीना ही एक मात्र उपाय है।

4.जूस: फेस पैक तैयार करते समय उसमें पानी की बजाय नींबूगाजर या ककड़ी का रस मिलाएं। यह तरीका अधिक फायदेमंद साबित होगा।
5.मसाज: जैतूनबादाम या नारियल के तेल से चेहरे की मसाज भी की जा सकती है। इसमें विटामिन ई होने से त्वचा का तेज बरकरार रहता है। वहीं मृत कोशिकाओं से मुक्ति भी मिलती है।

6.हल्दी: इसके पाउडर में गन्ने का रस मिलाकर तैयार पेस्ट लगाने से त्वचा में कसावट आती है। यह झुर्रियां दूर करने के साथ ही त्वचा निखारने में भी सहायक है। वहीं हल्दी की एंटीबैक्टीरियल प्रॉपर्टी त्वचा विकारों को भी दूर करती है।

7.  कच्ची सब्जियों का सलादफलों का रस व अंकुरित अनाज का सेवन भी झुर्रियों को दूर करने में सहायक है।

8.चनामूँगमैथीदाने और साबुत मसूर भिगोकर अंकुरित बना लें। इसमें नीबू का रस व काला नमक मिलाकर प्रतिदिन चबाकर खाएँ।

9.झुर्रियों से बचे रहना चाहते हैं तो सिगरेट से दूरी बना लें। सिगरेट एन्जाइम्स को एक्टिवेट कर देती हैजिससे हमारे चेहरे और शरीर के ऊपर झुर्रियां दिखाई पडऩे लगती हैं।

10. भरपूर नींद लें तो कम उम्र में झुर्रियों से बचे रहेंगे।

11.एक पका केला लें और उसमें एक चम्मच शहद मिला लें। इसे मसलकर चेहरे और गर्दन पर तकरीबन 15 मिनट के लिए लगा लें।
केले के गूदे में कुछ बूंदें जैतून के तेल की मिलाकर लगाने से झुर्रियां कम होती हैं।

माइग्रेन (आधे सिर में दर्द)

इस रोग से पीड़ित रोगी के सिर में बहुत तेज दर्द होता है तथा यह दर्द सिर के एक भाग में होता है। इस रोग का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से किया जा सकता है।

माइग्रेन (आधे सिर में दर्द) रोग होने का लक्षण:-

इस रोग से पीड़ित रोगी के सिर के आधे भाग में तेज दर्द होता है तथा सिर में दर्द होने के साथ-साथ रोगी को उल्टी होने की इच्छा भी होती है। इसके अलावा रोगी को चिड़चडाहट तथा दृष्टिदोष भी उत्पन्न होने लगता है। इस रोग का प्रभाव अधिकतर निश्चित समय पर होता है।

माइग्रेन (आधे सिर में दर्द) रोग होने का कारण-

1. माइग्रेन (आधे सिर में दर्द) रोग रोगी व्यक्ति को दूसरे रोगों के फलस्वरूप हो जाता है जैसे- नजला, जुकाम, शरीर के अन्य अंग रोग ग्रस्त होना, पुरानी कब्ज आदि।

2. स्त्रियों को यदि मासिकधर्म में कोई गड़बड़ी हो जाती है तो इसके कारण स्त्रियों को माइग्रेन रोग (आधे सिर में दर्द) हो जाता है।


3. आंखों में दृष्टिदोष तथा अन्य रोग होने के कारण भी माइग्रेन रोग (आधे सिर में दर्द) हो जाता है।

4. यकृत (जिगर) में किसी प्रकार की खराबी तथा शरीर में अधिक कमजोरी आ जाने के कारण व्यक्ति को माइग्रेन रोग (आधे सिर में दर्द) हो जाता है।


5. असंतुलित भोजन का अधिक उपयोग करने के कारण रोगी को माइग्रेन रोग (आधे सिर में दर्द) हो सकता है।

6. अधिक श्रम-विश्राम करने, शारीरिक तथा मानसिक तनाव अधिक हो जाने के कारण भी यह रोग व्यक्तियों को हो सकता है।


7. औषधियों का अधिक उपयोग करने के कारण भी माइग्रेन रोग (आधे सिर में दर्द) हो जाता है।


माइग्रेन रोग से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-


1. इस रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से इलाज करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को रसाहार (चुकन्दर, ककड़ी, पत्तागोभी, गाजर का रस तथा नारियल पानी) आदि का सेवन भोजन में करना चाहिए और इसके साथ-साथ उपवास रखना चाहिए।

माइग्रेन रोग (आधे सिर में दर्द) से पीड़ित रोगी को अधिक मात्रा में फल, सलाद तथा अंकुरित भोजन करना चाहिए और इसके बाद सामान्य भोजन का सेवन करना चाहिए।


3. रोगी व्यक्ति को अपने भोजन में मेथी, बथुआ, अंजीर, आंवला, नींबू, अनार, अमरूद, सेब, संतरा तथा धनिया अधिक लेना चाहिए। माइग्रेन रोग (आधे सिर में दर्द) से पीड़ित रोगी को भोजन संबन्धित गलत आदतों जैसे- रात के समय में देर से भोजन करना तथा समय पर भोजन न करना आदि को छोड़ देना चाहिए।

4. रोगी व्यक्ति को मसालेदार भोजन का उपयोग नहीं करना चाहिए तथा इसके अलावा बासी, डिब्बाबंद तथा मिठाइयों आदि का सेवन भी नहीं करना चाहिए।


5. माइग्रेन (आधे सिर में दर्द) रोग में रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक तुलसी के पत्तों का रस शहद के साथ सुबह के समय में चाटना चाहिए तथा इसके अलावा दूब का रस भी सुबह के समय में चाट सकते हैं। जिसके फलस्वरूप माइग्रेन रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

6. माइग्रेन रोग (आधे सिर में दर्द) का इलाज करने के लिए पीपल के कोमल पत्तों का रस रोगी व्यक्ति को सुबह तथा शाम सेवन करने के लिए देने के फलस्वरूप माइग्रेन रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।


7. माइग्रेन रोग का इलाज करने के लिए रोगी व्यक्ति के माथे पर पत्ता गोभी का पत्ता प्रतिदिन बांधना चाहिए, जिसके फलस्वरूप यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।


8. प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा नाक से भाप देकर रोगी व्यक्ति के माइग्रेन रोग को ठीक किया जा सकता है। नाक से भाप लेने के लिए सबसे पहल एक छोटे से बर्तन में गर्म पानी लेना चाहिए। इसके बाद रोगी को उस बर्तन पर झुककर नाक से भाप लेना चाहिए। इस क्रिया को कुछ दिनों तक करने के फलस्वरूप माइग्रेन रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।


9. माइग्रेन रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकर के स्नान भी हैं जिन्हे प्रतिदिन करने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है। ये स्नान इस प्रकार हैं-रीढ़स्नान, कुंजल, मेहनस्नान तथा गर्मपाद स्नान।


10. माइग्रेन (आधे सिर में दर्द) रोग का इलाज करने के लिए प्रतिदिन ध्यान, शवासन, योगनिद्रा, प्राणायाम या फिर योगासन क्रिया करनी चाहिए। इसके फलस्वरूप यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

होठों का कालापन दूर करने के प्राकृतिक उपाय

होंठों को खूबसूरत बनाने के लिए आप क्‍या नहीं करतीं। लिपस्टिक, लिप बाम, माश्‍चराइजर और ना जाने क्‍या-क्‍या। लेकिन, होंठों पर लगाये जाने वाले कई उत्‍पाद वास्‍तव में उन्‍हें खूबसूरत बनाने के बजाय लंबे समय में उन्‍हें नुकसान पहुंचा सकता है। अगर आप भी अपने होठों के फटने या कालेपन से परेशान हैं तो इस स्‍लाइड शो में बताए गए प्राकृतिक उपायों को अपनाकर अपनी समस्‍या से छुटकारा पा सकते हैं।
कोको बटर
दो बड़े चम्मच कोको बटर, आधा छोटा चम्मच मधु वैक्स लीजिए। उबलते पानी पर एक बर्तन में वैक्स डालकर पिघला दीजिए। इसमें कोको बटर मिलाएं। अब इस मिश्रण को ठंडा होने के बाद ब्रश की मदद से होंठों पर लगाइए। इससे होंठ मुलायम होंगे और उनका कालापन दूर हो जाएगा।
दूध की मलाई
होंठों से रूखापन हटाने के लिए थोडी सी मलाई में चुटकी भर हल्दी‍ मिलाकर नियमित रूप से धीरे-धीरे होठों पर मालिश करें। आप देखेंगे कि इस घरेलू उपाय से कुछ ही दिनों में आपके होठ मुलायम और गुलाबी होने लगेंगे
गुलाब की पंखुडियां
होंठों के कालेपन को दूर करने के लिए गुलाब की पंखुडि़यां बहुत ही फायदेमंद होती है। इसके नियमित इस्‍तेमाल से होठों का रंग हल्‍का गुलाबी और चमकदार हो जाएगा इसके लिए गुलाब की पंखुडियों को पीसकर उसमें थोड़ी सी नींबू
क्‍या आप जानते है होंठों को कालापन नींबू से भी दूर हो सकता है। इसके लिए आप निचोड़े हुए नींबू को अपने होठों पर सुबह और शाम को रगड़ें।
केसर
होंठों का कालापन दूर करने के लिये कच्चे दूध में केसर पीसकर होंठों पर मलें। इसके इस्‍तेमाल से होंठों का कालापन तो दूर होता ही है साथ ही वे पहले से अधिक आकर्षक बनने लगते हैं।
शहद
शहद के इस्‍तेमाल से कुछ ही दिनों में आपके होंठ चमकदार और मुलायम हो जाते हैं। इसके लिए थोड़ा-सा शहद अपनी उंगली में लेकर धीरे-धीरे अपने होंठों पर मलें या फिर शहद में थोड़ा सा सुहागा मिलाकर अपने होंठों पर लगाएं। ऐसा एक दिन में दो बार करें फिर देखें इसका असर।
जैतून का तेल
यदि होंठ पूरी तरह से फट चुके हैं और उनमें कालापन भी आ रहा है तो जैतून का तेल यानी ऑलिव ऑयल और वैसलीन मिलाकर दिन में तीन या चार बार फटे होंठों पर लगाने से फायदा होता है। इनका लेप होंठों पर 4-5 दिन लगातार लगाने से होठों की दरारें भी भरने लगती हैं और होंठ हल्‍के गुलाबी भी होने लगते हैं।
चुकंदर
चुकंदर को ब्‍लड बनाने वाली मशीन भी कहते है। चुकंदर होंठ के लिए भी उतना ही फायदेमंद होता है। चुकंदर को काटकर उसके टुकड़े को होंठों पर लगाने से होठ गुलाबी व चमकदार बनते हैं।

Friday, June 19, 2015

तेजपात

इसका पेड़ पचीस फुट तक ऊँचा होता है और इस पर पीले रंग के फूल लगते हैं। इसमें रासायनिक खोज करने पर तीन तरह के तेल पाए गए हैं। उतपत्त तेल ,यूजीनाल और आइसो यूजीनाल। इसे हिन्दी में तेजपात और संस्कृत में तमालपत्र कहते हैं। इसे वैज्ञानिक भाषा में Cinnamomum tamala कहते हैं।

       आइये इसके औषधीय गुणों पर दृष्टिपात करें -

दमा में ---तेजपात ,पीपल,अदरक, मिश्री सभी को बराबर मात्र में लेकर चटनी पीस  लीजिए।१-१ चम्मच चटनी रोज खाएं ४० दिनों तक। फायदा सुनिश्चित है।

दांतों के लिए ---सप्ताह में तीन दिन तेजपात के बारीक चूर्ण से मंजन कीजिए। दांत मजबूत होंगे, दांतों में कीड़ा नहीं लगेगा ,ठंडा गरम पानी नहीं लगेगा , दांत मोतियों की तरह चमकेंगे।

कीड़े से बचाने के लिए ----कपड़ों के बीच में तेजपात के पत्ते रख दीजिए ,ऊनी,सूती,रेशमी कपडे कीड़ों से बचे रहेंगे। अनाजों के बीच में ४-५ पत्ते डाल दीजिए तो अनाज में भी कीड़े नहीं लगेंगे। उनमें एक दिव्य सुगंध जरूर बस जायेगी।

शारीरिक दुर्गन्ध ----- अनेक लोगों के मोजों से दुर्गन्ध आती है ,वे लोग तेजपात का चूर्ण पैर के तलुवों में मल कर मोज़े पहना करें। पर इसका मतलब ये नहीं कि आप महीनों तक मोज़े धुलें ही न। वैसे भी अंदरूनी कपडे और मोज़े तो रोज धुलने चाहिए। मुंह से दुर्गन्ध आती है तो तेजपात का टुकड़ा चबाया करें। बगल के पसीने से दुर्गन्ध आती है तो तेजपात का चूर्ण पावडर की तरह बगलों में लगाया करें।

आँखों की रोशनी ----- अगर अचानक आँखों कि रोशनी कुछ कम होने लगी है तो तेजपात के बारीक चूर्ण को सुरमे की तरह आँखों में लगाएं। इससे आँखों की सफाई हो जायेगी और नसों में ताजगी आ जायेगी जिससे आपकी दृष्टि तेज हो जायेगी। इस प्रयोग को लगातार करने से चश्मा भी उतर सकता है।

गैस -----पेट में गैस की वजह से तकलीफ महसूस हो रही हो तो ३-४ चुटकी या ४ मिली ग्राम तेजपात का चूर्ण पानी से निगल लीजिए। एसीडिटी की तकलीफ में इसका लगातार सेवन बहुत फायदा करता है और पेट को आराम मिलता है।

हार्ट प्राब्लम ----- तेजपात का अपने भोजन में लगातार प्रयोग कीजिए ,आपका ह्रदय मजबूत बना रहेगा ,कभी हृदय रोग नहीं होंगे।

पागलपन -----एक एक ग्राम तेजपात का चूर्ण सुबह शाम रोगी को पानी या शहद से खिलाएं।या तेजपात के चूर्ण का हलुआ बनाकर खिलाएं। सूजी के हलवे में एक चम्मच तेजपात का चूर्ण डाल दीजिए। बन गया हलवा।

हकलाना ---- तेजपात के टुकड़ों को जीभ के नीचे रखा रहने दें ,चूसते रहे। एक माह में हकलाना खत्म हो जाएगा।

जुकाम ---- दिन में चार बार चाय में तेजपत्ता उबाल कर पीजिए ,जुकाम-जनित सभी कष्टों में आराम मिलेगा।
या चाय में चायपत्ती की जगह तेजपत्ता डालिए। खूब उबालिए ,फिर दूध और चीनी डालिए।

पेट दर्द ---- पेट की किसी भी बीमारी में तेजपत्ते का काढा बनाकर पीजिए। दस्त, आँतों के घाव, भूख न लगना सभी में आराम मिलेगा।  

Wednesday, June 17, 2015

अजवाइन के फायदे

अजवाइन का वानस्पतिक नाम ट्रेकीस्पर्मम एम्माई है। आयुर्वेद के अनुसार अजवाइन पाचन को दुरुस्त रखती है। यह कफ, पेट तथा छाती का दर्द और कृमि रोग में लाभदायक होती है। साथ ही, हिचकी, जी मचलाना, डकार, बदहजमी, मूत्र का रुकना और पथरी आदि बीमारी में भी फायदेमंद होती है। रसोई में उपयोग में आने वाले मसालों का औषधीय महत्व कितना हो सकता है इसका सटीक उदाहरण अजवाइन है। अजवाइन को सदियों से घरेलु नुस्खों में अनेक रोगों के निवारण के लिए अपनाया जाता रहा है।
अजवाइन में 7 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट,21 प्रतिशत प्रोटीन, 17 प्रतिशत खनिज ,7 प्रतिशत कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह, पोटेशियम, सोडियम, रिबोफ्लेविन, थायमिन, निकोटिनिक एसिड अल्प मात्रा में, आंशिक रूप से आयोडीन, शर्करा, सेपोनिन, टेनिन, केरोटिन और 14 प्रतिशत तेल पाया जाता है। इसमें मिलने वाला सुगंधित तेल 2 से 4 प्रतिशत होता है, 5 से 60 प्रतिशत मुख्य घटक थाइमोल पाया जाता है। मानक रूप से अजवाइन के तेल में थाइमोल 40 प्रतिशत होता है।
- पेट खराब है तो अजवाइन को चबाकर खाएं और उसके बाद एक कप गर्म पानी पी लें, पेट ठीक हो जाएगा।
- पेट दर्द होने पर अजवाइन के दाने10ग्राम, सोंठ 5ग्राम और काला नमक2 ग्राम को अच्छी तरह मिलाया जाए और फिर रोगी को इस मिश्रण का 3 ग्राम गुनगुने पानी के साथ दिन में 4-5दिया जाए तो आराम मिलता है।
- पेट में कीड़े हैं तो काले नमक के साथ अजवाइन खाएं।
- लीवर की परेशानी है तो3ग्राम अजवाइन और आधा ग्राम नमक खाने के बाद लेने से काफी लाभ होगा।
- पेट में गैस होने पर हल्दी, अजवाइन और एक चुटकी काला नमक लें, इससे भी बहुत जल्दी आराम मिलता है।
- पथरी की समस्या है तो 5ग्राम ग्राम जंगली अजवाइन को पानी के साथ निगल लें। ऐसा आप महीने में पांच दिन करें तो पथरी कभी नहीं बनेगी और बनी होगी तो बाहर निकल जाएगी।
- कुंदरू के फल, अजवायन, अदरक और कपूर की समान मात्रा लेकर कूट लिया जाए और एक सूती कपड़े में लपेटकर हल्का-हल्का गर्म करके सूजन वाले भागों धीमें -धीमें सिंकाई की जाए तो सूजन मिट जाती है।
-किसी शराब पीने वाले की आदत छुड़ाना चाहते हैं तो दिन में हर दो घंटे बाद उसे एक चुटकी अजवाइन चबाने को दें, बहुत जल्द उनकी शराब पीने की आदत छूट जाएगी।
-अजवाइन को भूनकर उसे पीस लें। इस मिश्रण से सप्ताह में दो-तीन बार दांत साफ करें। आपके दांत मजबूत और चमकदार होंगे। दांतों में दर्द होने पर अजवाइन को पानी में उबालकर पानी को गुनगुना कर लें। इस पानी से गरारे करें, दांत दर्द ठीक हो जाएगा।
- अजवाइन को पीस लिया जाए और नारियल तेल में इसके चूर्ण को मिलाकर ललाट पर लगाया जाए तो सिर दर्द में आराम मिलता है।
- अजवाइन को भूनकर कपड़े में लपेट लिया जाए और रात में तकिए के नजदीक रखा जाए तो दमा, सर्दी, खांसी के रोगियों को रात को नींद में सांस लेने मे तकलीफ नहीं होती है।
- अस्थमा के रोगी को यदि अजवाइन के बीज और लौंग की समान मात्रा का 5 ग्राम चूर्ण प्रतिदिन दिया जाए तो काफी फायदा होता है। अजवाइन को किसी मिट्टी के बर्तन में जलाकर उसका धुंआ भी दिया जाए तो अस्थमा के रोगी को सांस लेने में राहत मिलती है।
- अजवाइन के रस में दो चुटकी काला नमक मिलाकर उसका सेवन करें और उसके बाद गर्म पानी पी लें। खांसी ठीक हो जाएगी।
- काली खांसी से परेशान हैं तो जंगली अजवाइन के रस को सिरका और शहद के साथ मिलाकर दिन में 2 बार एक-एक चम्मच सेवन करें, राहत मिलेगी।
- गले में खराश हो तो बेर के पत्ते और अजवाइन दोनों को पानी में एक साथ उबाल कर उस पानी को छानकर पी लें।
- अदरक के रस में थोड़ा सा चूर्ण अजवाइन का मिलाकर लिया जाए तो खांसी में तुरंत आराम मिल जाता है।
- सूखी खांसी से परेशान हैं तो आप अजवाइन को पान में रखकर चबाएं। ऐसा करने से सूखी खांसी से राहत मिलेगी। इसके अलावा अजवाइन खाने से गले की सूजन और दर्द ठीक हो जाता है।
- नाक बंद होने पर आप अजवाइन को बारीक पीस कर उसे कपड़े में बांध कर सूंघें, आराम मिलेगा।
-खाने के बाद अजवाइन के साथ गुड़ खाने से सर्दी और एसिडिटी में आराम मिलता है।अजवाइन की 2 से 3ग्राम मात्रा को दिन में तीन बार लें। जुकाम, नजला और सिरदर्द में यह रामबाण दवा है।
- पान के पत्ते के साथ अजवाइन के बीजों को चबाया जाए तो गैस, पेट मे मरोड़ और एसीडिटी से निजात मिल जाती है।
- भूनी हुई अजवाइन की करीब1ग्राममात्रा को पान में डालकर चबाया जाए तो बदहजमी में तुरंत आराम मिल जाता है। सर्दी में शरीर को गर्मी देने के लिए थोड़ी-सी अजवाइन चबाएं और चबाने के बाद पानी के साथ निगल लें। ठंड से राहत मिलेगी।
-अजवाइन, इमली के बीज और गुड़ की समान मात्रा लेकर घी में अच्छी तरह भून लेते है और फिर इसकी कुछ मात्रा प्रतिदिन नपुंसकता से ग्रसित व्यक्ति को दें।ये मिश्रण पौरुषत्व बढ़ाने के साथ-साथ शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने में भी मदद करता है।
- एसिडिटी की तकलीफ है तो थोड़ा-थोड़ा अजवाइन और जीरा को एक साथ भून लें। फिर इसे पानी में उबाल कर छान लें। इस छने हुए पानी में चीनी मिलाकर पिएं, एसिडिटी से राहत मिलेगी।
- हैजा होने पर कर्पूर के साथ अजवाइन को मिला कर लेने से आराम मिलता है।
- नींद न आने की समस्या हो तो 2 ग्राम अजवाइन पानी के साथ निगल लें। इससे अच्छी नींद आएगी।
-खुजली हो या फिर कहीं जल गया हो, अजवाइन को पीस कर वहां लगाएं और 4 से 5 घंटे तक लगे रहने दें। इससे बहुत लाभ होगा।
- मुंह से बदबू आने और मुंह में छाले होने पर रात में अजवाइन का सेवन करें, परेशानी से मुक्ति मिलेगी।
- कान में दर्द है तो अजवाइन के तेल का इस्तेमाल करें, दर्द ठीक हो जाएगा।
- लीवर की परेशानी है तो3ग्राम अजवाइन और आधा ग्राम नमक खाने के बाद लेने से काफी लाभ होगा।
- पेट में गैस होने पर हल्दी, अजवाइन और एक चुटकी काला नमक लें, इससे भी बहुत जल्दी आराम मिलता है।
- पथरी की समस्या है तो 5ग्राम ग्राम जंगली अजवाइन को पानी के साथ निगल लें। ऐसा आप महीने में पांच दिन करें तो पथरी कभी नहीं बनेगी और बनी होगी तो बाहर निकल जाएगी।

Friday, June 12, 2015

लहसुन


लहसुन का पौधा
भारतीय रसोई के लिए कहा जाता है कि यह हर रोग के लिए अचूक दवाखाना है। उसी तरह लगभग हर घर में खाया जाने वाले लहसुन भी ऐसी ही एक गुणकारी दवा है। 'लशति छिंनति रोगान लशुनम्' अर्थात् जो रोग का ध्वंस करे उसे लहसुन (Garlic) कहते हैं। इसे रगोन् भी कहते हैं। लहसुन गुणों से भरपूर भारतीय सब्जियों का स्वाद बढ़ाने वाला ऐसा पदार्थ है जो प्रायः हर घर में इस्तेमाल किया जाता है। ज़्यादातर लोग इसे सिर्फ मसाले के साथ भोजन में ही इस्तेमाल करते हैं। परंतु यह औषधि के रूप में भी उतना ही फ़ायदेमंद है। लहसुन से होने वाले लाभ और इसके चिकित्सीय गुण सदियों पुराने हैं। शोध और अध्ययन बताते हैं कि आज से 5000 वर्ष पहले भी भारत में लहसुन का इस्तेमाल उपचार के लिए किया जाता था। भारत ने लहसुन को जन-जन तक पहुँचाने में काबिले तारीफ योगदान दिया। भारत के ही आयुर्वेदाचार्य की बदौलत लहसुन के गुणों को वैज्ञानिकों ने कसौटी पर कसा तथा यूनानमिस्र आदि देश के लोगों को इसके दिव्य गुणों से परिचित करवाया। वहीं से यह कंद अपने अमृतोपम गुणों के कारण दुनियाभर में लोकप्रिय हो गया। भोजन में लहसुन का प्रयोग मनुष्य प्राचीन समय से ही करता आ रहा है। इसकी गंध बहुत ही तेज और स्वाद तीखा होता है। कहा जाता है कि प्राचीन रोम के लोग अपने सिपाहियों को इसलिए लहसुन खिलाते थे क्योंकि उनका विश्वास था कि इसे खाने से शक्ति में वृद्धि होती है। मध्ययुग में प्लेग जैसे भयानक रोग के आक्रमण से बचने के लिए भी लहसुन का इस्तेमाल किया जाता था।
मसाले के तौर पर तो यह हरा और सूखा काम में लिया जाता है, पर इसके चिकित्सकीय गुणों से आज भी आम अवाम अनजान है। म्यूनिख रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. स्ट्रीफोर्ड ने अपने गहन शोध निष्कर्ष में इसे खुदा की ख़ास नियामत ठहराते हुए दिल, दिमाग और पूरे शरीर के लिए एक शक्तिशाली टॉनिक बताया है। आयुर्वेद में लहसुन को 'चमत्कारी दवा' माना जाता है। आयुर्वेद ग्रंथ 'भावप्रकाश' के मुताबिक - 'लहसुन वृष्य स्निग्ध, ऊष्णवीर्य, पाचक, सारक, रस विपाक में कटु तथा मधुर रस युक्त, तीक्ष्ण भग्नसंधानक (टूटी हड्डी जोड़ने वाला), पित्त एवं रक्तवर्धक, शरीर में बल, मेधाशक्ति तथा आँखों के लिए हितकर रसायन है। यह हृदय रोग, जीर्ण रोग (ज्वरादि), कटिशूल, मल एवं वातादिक की विबंधता, अरुचि, काम, क्रोध, अर्श, कुष्ठ, वायु, श्वांस तथा कफ नष्ट करने वाला सदाबहार कंद है।' इसे तेल, अवलेह, भस्म, खोया बनाकर, लहसुन कल्प कर, खीर बनाकर, छोंक लगाकर, हरी या सूखी अवस्था में चटनी, अचार बनाकर काम में लिया जाता है। लहसुन को पकाने से इसके बैक्टीरिया विरोधी तत्व नष्ट हो जाते हैं, लेकिन हृदय-रक्तवाहिका (कार्डियोवसक्यूलर) संबधी गुण बना रहता है। लहसुन हृदय रोगों और कैंसर के प्रति शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करता है। लहसुन की गंध से मच्छर भी दूर भागते हैं। लहसुन उत्तेजक और चर्मदाहक होता है।
  • बेशक लहसुन कुदरती खूबियों से लबरेज है। लेकिन इसे उचित अनुपात में ही लेना चाहिए। इस्तेमाल के वक्त कुछ अन्य सावधानियाँ भी ध्यान रखें। गौरतलब रहे कि लहसुन की तासीर काफ़ी गर्म और खुश्क रहती है। कई लोगों के मिज़ाज को यह सध नहीं पाता है। ख़ासकर गर्मी के मौसम में पित्त प्रधान प्रकृति वाले इसका इस्तेमाल संतुलित रूप में ही करें। अगर लहसुन का कुछ दुष्प्रभाव महसूस हो तो मरीज़ को गोंद कतीरा, धनिया, बादाम-रोगन, नीबूपुदीना देते रहने से उसका दुष्प्रभाव शमित हो जाएगा। घी में भून लेने से भी यह कुप्रभावी नहीं रहता। बीमारी की हालत में किसी जानकार के बताए अनुपात में ही लें एवं परहेज बताए तो वह भी रखें। जब तक हरा पत्तीदार उपलब्ध हो, ताजा ही काम में लें। बाद में सूखा लहसुन छिलके छीलकर ही इस्तेमाल करें। सदियों से भारतीय जनजीवन में लहसुन का विभिन्न रोगों में औषधिमूलक प्रयोग होता आ रहा है।
लहसुन

लहसुन का पौधा

लहसुन का पौधा यूरोप और एशिया का मूल पौधा है। यह इटली तथा दक्षिण फ्रांस के जंगलों में बहुत अधिक संख्या में पैदा होता है। अब इसे संसार के सभी देशों में पैदा किया जाता है। यह लिली परिवार में आता है। यह ज़मीन के अंदर पैदा होता है। यह कुछ-कुछ प्याज से मिलता-जुलता पौधा है, जिसके पौधे कोमल-कोमल काण्ड युक्त 30 से 60 सेण्टीमीटर लम्बे होते हैं। पत्तियाँ चपटी, पतली होती हैं व इनको मसलने पर एक प्रकार की उग्र गंध आती है। पुष्प दण्ड काण्ड के बीच से निकलता है, जिसके शीर्ष पर गुच्छेदार सफेद फूल लगते हैं। कन्द श्वेत या हल्के गुलाबी रंग के आवरण से ढँका होता है, जिसमें 5 से 12 छोटे-छाटे जौ के आकार के कन्द होते हैं। इन्हें कुचलने से तीव्र अप्रिय गंध आती है। सुर्ख शीतल स्थानों पर जहाँ हवा का समुचित प्रवेश होता हो इन्हें 6 मास तक सुरक्षित रखकर प्रयोग में लाया जा सकता है। आजकल बाज़ार में लहसुन के कैप्सूल भी मिलते हैं।

लहसुन के रासायनिक तत्व

लहसुन में रासायनिक तत्वों का भंडार है। इसकी एक-एक तुरी अनेक खाद्य तत्वों से भरपूर है। लहसुन में कई रसायनिक तत्व जैसे- वाष्पशील तेल 0.6 प्रतिशत, प्रोटीन 6.03 प्रतिशत, वसा 1.00 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 29.00 प्रतिशत, खनिज पदार्थ 1.00 प्रतिशत, चूना 0.3 प्रतिशत तथा लोहा 1.3 मिलीग्राम, प्रति 100 ग्राम पाये जाते हैं।
  • लहसुन में एलियम / एल्लीसिन नामक एंटीबायोटिक होता है जो बहुत से रोगों के बचाव में लाभप्रद है तथा जो उन किटाणुओं को नष्ट करता है जो पेनीसिलीन से नष्ट नहीं होते। रासायनिक दृष्टि से इसका उत्पत तेल संघटक-ऐलिन प्रोपाइल डाइसल्फाइड व दो अन्य गंधक युक्त यौगिक मुख्य भूमिका निभाते हैं। मेडीसिनल प्लाण्ट्स ऑफ इण्डिया के अनुसार लहसुन में पाया जाने वाला एलीन नामक जैव सक्रिय पदार्थ एक प्रचण्ड जीवाणुनाशी है। औषधि के 20 से 25 प्रतिशत घोल की जीवाणुनाशी क्षमता कार्बोलिक अम्ल से दो गुनी है। इसके बावजूद यह स्वस्थ ऊतकों को कोई हानि नहीं पहुँचाती। व्रणों पर इसे बिना किसी हानि के प्रयुक्त किया जा सकता है। लहसुन का जल निष्कर्ष (जियोवायोस-7.01, 1980) स्ट्रेप्टोकोकस फीकेलिस एवं इन कोलाय के विरुद्ध सामर्थ्य रखता है। कवकों की वृद्धि भी यह रोकता है। लहसुन का तेल लिनिमेण्ट व पुल्टिस सभी लाभप्रद होते हैं। बाह्य प्रयोगों में यह कड़ी गाँठ को गला देता है। वात रोगों में व लकवे में इसका बाह्य लाभ करता है। इसका लेप दमा, गठिया, सियाटिका चर्म रोगों तथा कुष्ठ में करते हैं।

लहसुन के औषधिये गुण

लहसुन
  • लहसुन की तीक्ष्णता और रोगाणुनाशक विशेषता के कारण यह चिकित्सा जगत में उपयोगी कंद है। मेहनतकश किसान-मज़दूर तो लहसुन की चटनी, रोटी खाकर स्वस्थ और कर्मठ बने रहते हैं। षडरस भोजन के 6 रसों में से पाँच रस लहसुन में सदैव विद्यमान रहते हैं। सिर्फ 'अम्ल रस' नहीं रहता। आज षडरस आहार दुर्लभ हो चला है। लहसुन उसकी आपूर्ति के लिए हर कहीं सस्ता, सुलभ है। लहसुन को गरीबों का 'मकरध्वज' कहा जाता है। वह इसलिए कि इसका लगातार प्रयोग मानव जीवन को स्वास्थ्य संवर्धक स्थितियों में रखता है। हेल्थ एक्सपर्ट हर रोज सुबह-उठकर ख़ाली पेट लहसुन की दो-तीन कलियां गुनगुने पानी से लेने की बात कहते हैं।
  • तेज गंध वाली लहसुन एक संजीवनी है जो कैंसर, एड्स और हृदय रोग के विरुद्ध सुरक्षा कवच बन सकती है। त्वचा को दाग़-धब्बे रहित बनाने, मुंहासों से बचने और पेट को साफ़ करने में भी लहसुन बढिय़ा है। इसे बादी कम करने वाला माना जाता है, इसीलिए बैंगन या उड़द की दाल जैसी बादी करने वाली चीजों में इसे डालने की सलाह दी जाती है। यह ख़ून को साफ़ कर शरीर के अंदरूनी सिस्टम की सफाई करता है। अगर आपका वजन अधिक है और इसे कम करना चाहते हैं तो सुबह-शाम लहसुन की दो-दो कलियां खाएं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत करने, कैंसर, अल्सर और हैमरॉयड से लडऩे में लहसुन को फ़ायदेमंद बताया गया है। इसमें मौजूद सल्फर से एलर्जी महसूस करने वाले इसे न ही खाएं और न ही त्वचा पर लगाएं।
  • सड़े-गले व्रणों पर लगाने में लहसुन प्रति संक्रामक का कार्य करती है तथा घाव भरने में मदद करती है। लहसुन बाह्यतः लेपन और विलयन है। इसे पीसकर, एण्टीबायोटिक क्रीम की तरह लगाते हैं व अधपकी फुन्सियों को पकाने के लिए भी प्रयुक्त करते हैं। व्यावहारिक प्रयोग में संधिवात गुधसी, शोथ वेदना प्रधान रोगों में लहसुन के तेल से मालिश करते हैं। पार्श्वशूल में इसके कल्क का लेप व स्वरस की मालिश करते हैं। खुजली, दाद, विशेषकर, रिंगवर्म जैसे फंगल संक्रमणों में लहसुन के तेल का लेप आराम देता है। पक्षाघात में इसके अभिमर्दन से माँसपेशियों के पुनः सक्रिय होने की संभावनाएँ बढ़ती है।
  • आखिर क्या है, लहसुन की इन छोटी-छोटी कलियों में जिन्हें हम ख़ासतौर पर सर्दियों में दाल-सब्जी में तड़का लगाने के लिए इस्तेमाल करते हैं ? आपकी रसोई की ये कलियां बड़े काम की चीज़ हैं। आइए जानते हैं, इनके कुछ औषधीय गुणों के बारे में - दादी मां का ख़ज़ाना हो या नानी मां की नसीहत, हर जगह लहसुन को चमत्कारी फ्लू जैसी छोटी-सी बीमारी से लेकर कैंसर जैसी बड़ी बीमारी के उपचार में भी सहायक होता है।
लहसुन
हृदय रोग
यह हृदय रोगियों के लिए एक महत्त्वपूर्ण औषधि है। उच्च रक्तचाप के उपचार में लहसुन को उपयोगी माना गया है। लहसुन में पाया जाने वाला सल्फाइड्स रक्तचाप को कम करने में मदद करता है। वे सल्फाइड्स लहसुन को पकाने के दौरान भी नष्ट नहीं होते हैं। यानी सब्जी, दाल में जब आप लहसुन का छौंक लगाती हैं, तब भी उसका ये गुण नष्ट नहीं होता। लहसुन के सेवन से रक्त में थक्का बनने की प्रवृत्ति बेहद कम हो जाती है, जिससे हृदयाघात का ख़तरा टलता है। यह बिंबागुओं (Platelates) को चिपकने से रोकता है। थक्कों को गलाता है। धमनियों को फैलाकर रक्तचाप घटाता है। हाई ब्लड प्रेशर वालों के लिए यह अमृत के समान है। नियमित लहसुन को दूध में उबालकर लेते रहने से ब्लडप्रेशर कम या ज़्यादा होने की बीमारी नहीं होती।
कॉलेस्ट्रोल की समस्या से पीड़ित लोगों के लिए लहसुन का नियमित सेवन अमृत साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है कि लगातार चार हफ्ते तक लहसुन खाने से कॉलेस्ट्रोल का स्तर 12 प्रतिशत तक या उससे भी कम हो सकता है। जिगर के अंदर मेटाबोलिज्म में सुधार लाकर कोलेस्ट्रॉल कम करता है और एरिथमिया को नियमित करता है। 'जर्नल ऑफ न्यूट्रीशन' के एक अध्ययन के मुताबिक लहसुन के सेवन से कोलेस्ट्रॉल में 10 फीसदी गिरावट आती है। यदि रोज नियमित रूप से लहसुन की पाँच कलियाँ खाई जाएँ तो हृदय संबंधी रोग होने की संभावना में कमी आती है।
गर्भवती महिलाओं को लहसुन का सेवन नियमित तौर पर करना चाहिए। गर्भवती महिला को अगर उच्च रक्तचाप की शिकायत हो तो, उसे पूरी गर्भावस्था के दौरान किसी न किसी रूप में लहसुन का सेवन करना चाहिए। यह रक्तचाप को नियंत्रित रख कर शिशु को नुकसान से बचाता है। उससे भावी शिशु का वजन भी बढ़ता है और समय पूर्व प्रसव का ख़तरा भी कम होता है।
मधुमेह
यह मधुमेह रोग में इन्सुलिन स्राव बढ़ाकर, रक्त शर्करा स्तर घटा देता है। मधुमेह के रोगियों को प्रातः निराहार ही त्रिफला और लहसुन का रस 25 ग्राम की मात्रा में कुछ दिन लगातार लेना चाहिए।
दमा, सर्दी, जुकाम और कफ
लहसुन
ठंड के मौसम में होने वाले सर्दी, जुकाम और कफ बनने की समस्या से राहत पाने के लिए नियमित रूप से लहसुन का सेवन करना जरूरी है। यह फेफड़ों की जकड़न को ठीक करने में मदद करता है, श्वसन मार्ग में श्लेष्मा (म्यूकस) को ढीला करता है तथा सर्दी जुकाम को रोकने में सहायक है। अदरक, नींबू, नमक, जीरा, सौंफ, अनारदाना, लहसुन की चटनी पीसकर खाँसी, दमा, कफजन्य रोगों से ग्रस्त को चटाना चाहिए। इससे बलगम निकल जाता है। लहसुन का तेल सवेरे निराहार पानी के साथ लेने से पुरानी से पुरानी खाँसी में भी फ़ायदा होता है। यदि काली खाँसी की शिकायत हो, तो लहसुन के रस की पाँच-पाँच बूंदें सुबह-शाम लेनी चाहिए। जुकाम और सर्दी में तो यह रामबाण की तरह काम करता है। पाँच साल तक के बच्चों में होने वाले प्रॉयमरी कॉम्प्लेक्स में यह बहुत फ़ायदा करता है। लहसुन को दूध में उबालकर पिलाने से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। लहसुन की कलियों को आग में भून कर खिलाने से बच्चों की साँस चलने की तकलीफ पर काफ़ी काबू पाया जा सकता है। जिन बच्चों को सर्दी ज़्यादा होती है उन्हें लहसुन की कली की माला बनाकर पहनाना चाहिए।
पेशी विश्राम
वायरस और बैक्टीरिया से बचने के लिए ताजा लहसुन खाना ही फ़ायदेमंद होता है। ताजे लहसुन में एंटीबैक्टिरियल गुण होते हैं, इसके एंटीबैक्टीरियल गुण इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करते हैं। यह एंटीबॉयटिक, एंटी फंगल और रोगाणुनाशक है। यह ग्राम पॉजिटिव और ग्राम नेगेटिव बैक्टीरिया को नियंत्रित करता है। इसके प्रयोग से माँसपेशियों को आराम मिलता है, दांत,आंत और श्वसन मार्ग के संदूषणों पर नियत्रण रखता है।
जोड़ों का दर्द
लहसुन गठिया और अन्य जोड़ों के रोग में भी लहसुन का सेवन बहुत ही लाभदायक है। लहसुन का इस्तेमाल जोड़ों के दर्द या गठिया में होता है तथा यह सूजन का भी नाश करती है। यह जोड़ों के दर्द के उद्दीपन को घटाता है। लहसुन की पुल्टिस को किसी भी सूजे भाग पर बाँधने या ताजा स्वरस रगड़ने से सूजन मिटती है। स्वरस में नमक मिलाकर नीलों (ब्रूस) व मोच (स्प्रेन) में सूजन उतारने हेतु प्रयुक्त करते हैं।
पाचनप्रणाली
पाचन-क्रिया को लहसुन से बड़ा बल मिलता है। लहसुन एक बढ़िया वातसारी एवं गैस्ट्रिक प्रेरक है और भोजन को पचाने तथा जज्ब करने में मदद करता है। गैस्टिक ट्रबल और एसिडिटी की शिकायत में इसका प्रयोग बहुत ही लाभदायक होता है। यह आँतों के छिपे मल को भी बाहर निकाल देती है और कब्ज से मुक्ति दिलाती है।
पेचिश
पेचिश में 10 ग्राम लहसुन का रस मट्ठे में मिलाकर सुबह, दोपहर, शाम कुछ दिनों तक लें। रस हर बार ताजा निकालें। आशातीत लाभ होने पर बंद कर दें।
लहसुन
डाइयूरेटिक
इसकी प्रकृति मूत्रवर्धक है। पेशाब रुकने पर पेट के निचले भाग में लहसुन की पुल्टिस बाँधने से मूत्राशय की निषक्रियता दूर होती है।
कैंसर
कैंसर के उपचार में लहसुन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। कई चिकित्सीय शोध बताते हैं कि लहसुन का नियमित सेवन करने वाले लोगों को कैंसर होने की आशंका बेहद कम होती है। लहसुन में कैंसर से लड़ने की विलक्षण क्षमता है। यह निरोधक प्रणाली को प्रेरित करता है, कैंसर भड़काने वाले तत्वों का निर्विषीकरण करता है और नाइट्रेट के निर्माण में बाधा बनकर यह पाचन मार्ग, स्तन तथा प्रोस्टेट के कैंसरों के इलाज में बहुत प्रभावकारी है। 'एनल्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन' की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रति सप्ताह पांच दाना लहसुन खाने से कैंसर का ख़तरा 30 से 40 फीसदी कम हो जाता है। लहसुन में कैंसर निरोधी तत्व होते हैं। यह शरीर में कैंसर बढ़ने से रोकता है। लहसुन के सेवन से ट्यूमर को 50 से 70 फीसदी तक कम किया जा सकता है।
शक्तिवर्धक
इसमें कई पोषक तत्व भी पाये जाते हैं। प्रतिदिन लहसुन की एक कली के सेवन से शरीर को विटामिन ए, बी और सी के साथ आयोडीन, आयरनपोटेशियमकैल्शियम औरमैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व एक साथ मिल जाते हैं। इसमें लौह तत्व होते हैं, इसलिए यह रक्त निर्माण में सहायक है। इसमें विटामिन 'सी' होने से यह स्कर्वी रोग से बचाने में मदद करता है।
थायरॉयड
इसमें निहित आयोडीन से गोइटर और हाइपोथायरॉयटिज्म बाधित व नियंत्रित होता है।
विषैले कीड़ों के काटने में
साँप तथा बिच्छू के काटे पर लहसुन की ताजी कलियाँ पीसकर लगाएँ। जहाँ तक ज़हर चढ़ गया हो, वहाँ तक इस लेप को लगाकर पट्टी बाँध देने से ज़हर उतर जाता है। बिच्छू के काटे स्थान पर डंक साफकर लहसुन और अमचूर पीसकर लगाने से ज़हर उतर जाता है। डंक ग्रस्त भाग पर पिसी चटनी भी लगाएँ। इसको पीसकर त्वचा पर लेप करने से विषैले कीड़ों के काटने या डंक मारने से होने वाली जलन कम हो जाती है।
लहसुन
  • जी मचलने पर लहसुन की कलियाँ चबा लें या लहसुनादि वटी चूसें, हरे पत्तों की चटनी भी लाभकारी रहती है।
  • गला बैठ रहा हो तो कुनकुने पानी में लहसुन का रस मिलाकर गरारे करें।
  • कर्णशूल में लहसुन और अदरक बराबर की मात्रा में लेकर अच्छी तरह कूटकर इसे कपड़े से छान लें। इसे कुनकुना करके कान की पीड़ा में कान में डाल लें।
  • मलेरिया के रोगी को भोजन से पहले तिल के तेल में भुना लहसुन खिलाना चाहिए।
  • इन्फ्लूएंजा में लहसुन का रस पानी में मिलाकर चार-चार घंटे बाद दें। मूँग की दाल के पानी, अदरक के रस, शहद के साथ भी दिया जा सकता है। हल्दी और लहसुन का पिसा पेस्ट गरम करके सहने योग्य कर छाती पर थोड़ी देर बाँधें।
अन्य
लहसुन के निरन्तर प्रयोग से असमय ही बुढ़ापे के शिकार से बचा जा सकता है, यानि झुर्रियाँ न होना। लहसुन में सेलेनियम है जो स्वतंत्र कोशिकाओं के तटस्थ और वृद्ध होने की प्रक्रिया धीमी कर देता है। यह एंटीऑक्सीडेंट और प्रतिरोध प्रेरक है। आँखों की रोशनी के लिए भी लहसुन लाभदायक माना जाता है। सर्दियों में लहसुन का रेगुलर इस्तेमाल करने से कई बीमारियों से बचा जा सकता है। यह शरीर के लिए एंटीसेप्टिक का काम करता है। लहसुन में एंटीबायोटिक दवाओं से अधिक गुण हैं, जिसकी वजह से वह रोगाणुओं का नाश करती है। यही कारण है कि घाव धोने के लिए लहसुन के एक भाग रस में तीन भाग पानी मिलाकर काम में लिया जाता है।

  • अकसर लहसुन के इतने सारे लाभ की जानकारी होने के बाद भी लोग लहसुन के गंध के कारण इसे खाने से परहेज करते हैं। लेकिन प्रकृति के इस अद्भुत उपहार को अच्छी सेहत और रोगों से लड़ने की प्रतिरोधी क्षमता के लिए भोजन में शामिल करना, कड़वी दवाइयों से बेहतर ही होगा। हमारी रसोई में ऐसे ही चमत्कारिक गुणों वाली कई औषधियों का रोजाना इस्तेमाल होता है। जानकारी के अभाव में उनके स्वाद और सुगंध को महत्व देने की जगह गुणों को पखरिए। कई बीमारी और परेशानियां पल में दूर हो जाएंगी और आप व आपका परिवार स्वस्थ भी रहेगा।